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VINOD KUMAR SHUKLA | नहीं रहें ज्ञानपीठ विजेता कवि विनोद कुमार शुक्ल

 

रायपुर। हिंदी साहित्य जगत से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। जाने-माने कवि-कथाकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का आज रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे 88 साल के थे और बीते कुछ महीनों से अस्वस्थ चल रहे थे। दो दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था।

आने वाली पहली जनवरी को विनोद कुमार शुक्ल 89 वर्ष के होने वाले थे, लेकिन उससे पहले ही साहित्य जगत ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया। उनके निधन की खबर मिलते ही छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है।

खास बात यह है कि बीमारी के बावजूद भी विनोद कुमार शुक्ल का लेखन नहीं रुका। उनके पुत्र शाश्वस्त के मुताबिक, एम्स में भर्ती होने के कुछ दिन बाद जब डॉक्टर ने उनसे पूछा कि वे क्या चाहते हैं, तो उन्होंने इशारे से सिर्फ एक बात कही लिखना। कागज-कलम मिलने पर उन्होंने अपनी आखिरी पंक्तियां लिखीं “बत्ती मैंने पहले बुझाई / फिर तुमने बुझाई / फिर दोनों ने मिलकर बुझाई।”

विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में हुआ था। वे रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे और 90 के दशक में सेवानिवृत्त हुए। साहित्यिक जीवन की शुरुआत के दौरान उनका संपर्क महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध से हुआ, जिन्होंने उनकी कविताओं को सबसे पहले पहचान दिलाई।

1971 में आए उनके पहले कविता संग्रह लगभग जय हिंद ने उन्हें साहित्य जगत में पहचान दिलाई। इसके बाद वह आदमी चला गया गरम कोट पहनकर जैसे संग्रहों ने पाठकों को गहराई से प्रभावित किया। 1979 में प्रकाशित उपन्यास नौकर की कमीज ने उन्हें कथा साहित्य में भी स्थापित कर दिया, जिस पर बाद में फिल्म भी बनी।

उनकी रचनाओं में आम आदमी, मध्यवर्ग, आदिवासी जीवन और मानवीय संवेदनाओं की गहरी झलक मिलती है। सहज भाषा में गहरी बात कहना उनकी सबसे बड़ी ताकत रही।

विनोद कुमार शुक्ल को 1997 में दीवार में एक खिड़की रहती थी उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। हाल ही में उन्हें देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया।

उनके निधन से हिंदी साहित्य का एक युग समाप्त हो गया है।

 

 

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